भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 9.12 · मोघाशा मोघकर्माणो

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥

moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ |
rākṣasīmāsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

उनकी आशाएँ व्यर्थ हैं, उनके कर्म व्यर्थ हैं, उनका ज्ञान व्यर्थ है; विवेकहीन होकर वे राक्षसी और आसुरी मोहक स्वभाव को ही पकड़े रहते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 9.12 का अर्थ क्या है?

उनकी आशाएँ व्यर्थ हैं, उनके कर्म व्यर्थ हैं, उनका ज्ञान व्यर्थ है; विवेकहीन होकर वे राक्षसी और आसुरी मोहक स्वभाव को ही पकड़े रहते हैं।

भगवद्गीता 9.12 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।