भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 8.8 · अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥
abhyāsayogayuktena cetasā nānyagāminā |
paramaṃ puruṣaṃ divyaṃ yāti pārthānucintayan ||
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ, अभ्यास-योग से अनुशासित और कहीं और न भटकने वाले मन से निरन्तर ध्यान करता हुआ मनुष्य उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 8.8 का अर्थ क्या है?
हे पार्थ, अभ्यास-योग से अनुशासित और कहीं और न भटकने वाले मन से निरन्तर ध्यान करता हुआ मनुष्य उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
भगवद्गीता 8.8 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।