भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 8.3 · अक्षरं ब्रह्म परमं
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo’dhyātmamucyate |
bhūtabhāvodbhavakaro visargaḥ karmasaṃjñitaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान बोले: परम अविनाशी तत्त्व ब्रह्म है। उसका अपना स्वभाव अध्यात्म कहलाता है। जिस सृजनात्मक अर्पण से प्राणियों का अस्तित्व उत्पन्न होता है, उसे कर्म कहा जाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 8.3 का अर्थ क्या है?
श्रीभगवान बोले: परम अविनाशी तत्त्व ब्रह्म है। उसका अपना स्वभाव अध्यात्म कहलाता है। जिस सृजनात्मक अर्पण से प्राणियों का अस्तित्व उत्पन्न होता है, उसे कर्म कहा जाता है।
भगवद्गीता 8.3 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।