भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 22 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 8.22 · पुरुषः स परः पार्थ

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā |
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvamidaṃ tatam ||

हिन्दी अनुवाद

हे पार्थ, जिसके भीतर सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 8.22 का अर्थ क्या है?

हे पार्थ, जिसके भीतर सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है।

भगवद्गीता 8.22 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।