भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 11 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 8.11 · यदक्षरं वेदविदो वदन्ति

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥

yadakṣaraṃ vedavido vadanti
viśanti yadyatayo vītarāgāḥ |
yadicchanto brahmacaryaṃ caranti
tatte padaṃ saṃgraheṇa pravakṣye ||

हिन्दी अनुवाद

वेद को जानने वाले जिसे अक्षर कहते हैं, आसक्ति से मुक्त संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसे पाने की इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस पद का वर्णन मैं तुमसे संक्षेप में करूँगा।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 8.11 का अर्थ क्या है?

वेद को जानने वाले जिसे अक्षर कहते हैं, आसक्ति से मुक्त संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसे पाने की इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस पद का वर्णन मैं तुमसे संक्षेप में करूँगा।

भगवद्गीता 8.11 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।