भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.7 · मत्तः परतरं धनञ्जय
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
mattaḥ parataraṃ nānyatkiñcidasti dhanañjaya |
mayi sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva ||
हिन्दी अनुवाद
हे धनञ्जय, मुझसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सब कुछ मुझमें ऐसे पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियाँ पिरोई रहती हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.7 का अर्थ क्या है?
हे धनञ्जय, मुझसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सब कुछ मुझमें ऐसे पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियाँ पिरोई रहती हैं।
भगवद्गीता 7.7 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।