भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 7.21 · यो यो यां यां तनुं भक्तः

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥

yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati |
tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyaham ||

हिन्दी अनुवाद

जो भक्त श्रद्धा से जिस किसी रूप की पूजा करना चाहता है, उस रूप में उसकी श्रद्धा को मैं ही दृढ़ कर देता हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 7.21 का अर्थ क्या है?

जो भक्त श्रद्धा से जिस किसी रूप की पूजा करना चाहता है, उस रूप में उसकी श्रद्धा को मैं ही दृढ़ कर देता हूँ।

भगवद्गीता 7.21 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।