भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 13 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.13 · त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥
tribhirguṇamayairbhāvairebhiḥ sarvamidaṃ jagat |
mohitaṃ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayam ||
हिन्दी अनुवाद
इन तीन गुणों से बने भावों से मोहित होकर यह सारा जगत मुझे नहीं पहचानता, जो इन गुणों से परे और अविनाशी हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.13 का अर्थ क्या है?
इन तीन गुणों से बने भावों से मोहित होकर यह सारा जगत मुझे नहीं पहचानता, जो इन गुणों से परे और अविनाशी हूँ।
भगवद्गीता 7.13 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।