भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.6 · बन्धुरात्मात्मनस्तस्य

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ |
anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||

हिन्दी अनुवाद

जिसने अपने आप को जीत लिया है, वह स्वयं अपना मित्र है; पर जिसने अपने को नहीं जीता, उसका अपना ही मन शत्रु की तरह उससे शत्रुता करता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.6 का अर्थ क्या है?

जिसने अपने आप को जीत लिया है, वह स्वयं अपना मित्र है; पर जिसने अपने को नहीं जीता, उसका अपना ही मन शत्रु की तरह उससे शत्रुता करता है।

भगवद्गीता 6.6 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।