भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 44 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.44 · पूर्वाभ्यासेन तेनैव सः

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥

pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo’pi saḥ |
jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate ||

हिन्दी अनुवाद

पिछले अभ्यास के कारण ही वह न चाहते हुए भी योग की ओर खिंच जाता है। योग को केवल जानने की इच्छा रखने वाला भी वेदों के कर्मकाण्ड से आगे निकल जाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.44 का अर्थ क्या है?

पिछले अभ्यास के कारण ही वह न चाहते हुए भी योग की ओर खिंच जाता है। योग को केवल जानने की इच्छा रखने वाला भी वेदों के कर्मकाण्ड से आगे निकल जाता है।

भगवद्गीता 6.44 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।