भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 35 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.35 · असंशयं महाबाहो मनो चलम्

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam |
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||

हिन्दी अनुवाद

श्रीभगवान बोले: हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और इसे वश में करना कठिन है; पर हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.35 का अर्थ क्या है?

श्रीभगवान बोले: हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और इसे वश में करना कठिन है; पर हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

भगवद्गीता 6.35 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।