भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.28 · युञ्जन्नेवं सदात्मानं

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥

yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ |
sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute ||

हिन्दी अनुवाद

इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पाप से मुक्त योगी सहज ही ब्रह्म के संपर्क का अनंत सुख पाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.28 का अर्थ क्या है?

इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पाप से मुक्त योगी सहज ही ब्रह्म के संपर्क का अनंत सुख पाता है।

भगवद्गीता 6.28 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।