भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 40 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.40 · अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati |
nāyaṃ loko’sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशय से भरा व्यक्ति नष्ट हो जाता है। संशयग्रस्त के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.40 का अर्थ क्या है?
अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशय से भरा व्यक्ति नष्ट हो जाता है। संशयग्रस्त के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।
भगवद्गीता 4.40 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।