भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 32 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.32 · एवं बहुविधा यज्ञा वितता

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥

evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe |
karmajānviddhi tānsarvānevaṃ jñātvā vimokṣyase ||

हिन्दी अनुवाद

इस प्रकार वेद की वाणी में अनेक प्रकार के यज्ञ विस्तार से बताए गए हैं। उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो; ऐसा जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.32 का अर्थ क्या है?

इस प्रकार वेद की वाणी में अनेक प्रकार के यज्ञ विस्तार से बताए गए हैं। उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो; ऐसा जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

भगवद्गीता 4.32 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।