भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.21 · निराशीर्यतचित्तात्मा
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ |
śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||
हिन्दी अनुवाद
जो आशा से रहित है, जिसने मन और शरीर को वश में किया है, जिसने संग्रह का सब भाव छोड़ दिया है, वह केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करते हुए पाप का भागी नहीं होता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.21 का अर्थ क्या है?
जो आशा से रहित है, जिसने मन और शरीर को वश में किया है, जिसने संग्रह का सब भाव छोड़ दिया है, वह केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करते हुए पाप का भागी नहीं होता।
भगवद्गीता 4.21 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।