भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.16 · किं कर्म किमकर्मेति
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
kiṃ karma kimakarmeti kavayo’pyatra mohitāḥ |
tatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase’śubhāt ||
हिन्दी अनुवाद
कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह रहस्य बताऊँगा जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.16 का अर्थ क्या है?
कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह रहस्य बताऊँगा जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।
भगवद्गीता 4.16 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।