भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 13 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.13 · चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ |
tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam ||
हिन्दी अनुवाद
गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार चार वर्णों की व्यवस्था मैंने रची है। उसका रचयिता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.13 का अर्थ क्या है?
गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार चार वर्णों की व्यवस्था मैंने रची है। उसका रचयिता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।
भगवद्गीता 4.13 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।