भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.9 · यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥

yajñārthātkarmaṇo’nyatra loko’yaṃ karmabandhanaḥ |
tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara ||

हिन्दी अनुवाद

यज्ञ के लिए किए गए कर्म के सिवा बाकी कर्मों से यह संसार बँधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति छोड़कर उसी उद्देश्य से कर्म करो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.9 का अर्थ क्या है?

यज्ञ के लिए किए गए कर्म के सिवा बाकी कर्मों से यह संसार बँधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति छोड़कर उसी उद्देश्य से कर्म करो।

भगवद्गीता 3.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।