भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.12 · इष्टान्भोगान्हि वो देवा

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥

iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ |
tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||

हिन्दी अनुवाद

यज्ञ से संतुष्ट होकर देवता तुम्हें मनचाहे भोग देंगे। जो उनके दिए हुए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना स्वयं भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.12 का अर्थ क्या है?

यज्ञ से संतुष्ट होकर देवता तुम्हें मनचाहे भोग देंगे। जो उनके दिए हुए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना स्वयं भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।

भगवद्गीता 3.12 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।