भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 8 · अर्जुन
भगवद्गीता 2.8 · न हि प्रपश्यामि
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām |
avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṃ rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam ||
हिन्दी अनुवाद
पृथ्वी पर निष्कंटक और समृद्ध राज्य, या देवताओं पर प्रभुत्व पाकर भी मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.8 का अर्थ क्या है?
पृथ्वी पर निष्कंटक और समृद्ध राज्य, या देवताओं पर प्रभुत्व पाकर भी मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके।
भगवद्गीता 2.8 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।