भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 66 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.66 · नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā |
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham ||
हिन्दी अनुवाद
जो योग से युक्त नहीं, उसमें स्थिर बुद्धि नहीं होती और न ही भावना (ध्यान) होती है। बिना ध्यान के शांति नहीं, और शांति के बिना सुख कहाँ?
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.66 का अर्थ क्या है?
जो योग से युक्त नहीं, उसमें स्थिर बुद्धि नहीं होती और न ही भावना (ध्यान) होती है। बिना ध्यान के शांति नहीं, और शांति के बिना सुख कहाँ?
भगवद्गीता 2.66 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।