भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 6 · अर्जुन
भगवद्गीता 2.6 · न चैतद्विद्मः कतरन्नो वा
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥
na caitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ |
yāneva hatvā na jijīviṣāma- ste’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है — हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी न चाहें, वही धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.6 का अर्थ क्या है?
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है — हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी न चाहें, वही धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।
भगवद्गीता 2.6 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।