भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 55 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.55 · प्रजहाति यदा मनोगतान्

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān |
ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate ||

हिन्दी अनुवाद

श्रीभगवान बोले: हे पार्थ, जब मनुष्य मन में उठने वाली सारी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा के द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.55 का अर्थ क्या है?

श्रीभगवान बोले: हे पार्थ, जब मनुष्य मन में उठने वाली सारी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा के द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

भगवद्गीता 2.55 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।