भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 47 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.47 · कर्मण्येवाधिकारस्ते मा

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana |
mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo’stvakarmaṇi ||

हिन्दी अनुवाद

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों पर कभी नहीं। कर्म के फल को अपना प्रेरक मत बनाओ, और कर्म न करने से भी तुम्हारा लगाव न हो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.47 का अर्थ क्या है?

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों पर कभी नहीं। कर्म के फल को अपना प्रेरक मत बनाओ, और कर्म न करने से भी तुम्हारा लगाव न हो।

भगवद्गीता 2.47 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।