भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 45 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.45 · त्रैगुण्यविषया वेदा
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥
traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna |
nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān ||
हिन्दी अनुवाद
वेद तीन गुणों के क्षेत्र की बातें करते हैं; हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वन्द्वों से मुक्त, सदा सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, पाने और सहेजने की चिंता से रहित होकर आत्मा में टिके रहो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.45 का अर्थ क्या है?
वेद तीन गुणों के क्षेत्र की बातें करते हैं; हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वन्द्वों से मुक्त, सदा सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, पाने और सहेजने की चिंता से रहित होकर आत्मा में टिके रहो।
भगवद्गीता 2.45 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।