भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 33 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.33 · अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं न
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
atha cettvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi |
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi ||
हिन्दी अनुवाद
पर यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागी बनोगे।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.33 का अर्थ क्या है?
पर यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागी बनोगे।
भगवद्गीता 2.33 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।