भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 31 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.31 · स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi |
dharmyāddhi yuddhācchreyo’nyatkṣatriyasya na vidyate ||
हिन्दी अनुवाद
अपने धर्म को देखते हुए भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी और कुछ नहीं है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.31 का अर्थ क्या है?
अपने धर्म को देखते हुए भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी और कुछ नहीं है।
भगवद्गीता 2.31 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।