भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.21 · वेदाविनाशिनं नित्यं य

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥

vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam |
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam ||

हिन्दी अनुवाद

हे पार्थ, जो इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसे और कैसे मरवा सकता है, या किसे मार सकता है?

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.21 का अर्थ क्या है?

हे पार्थ, जो इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसे और कैसे मरवा सकता है, या किसे मार सकता है?

भगवद्गीता 2.21 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।