भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.17 · अविनाशि तु तद्विद्धि येन

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥

avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam |
vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati ||

हिन्दी अनुवाद

जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अविनाशी का विनाश कोई नहीं कर सकता।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.17 का अर्थ क्या है?

जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अविनाशी का विनाश कोई नहीं कर सकता।

भगवद्गीता 2.17 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।