भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.15 · यं हि न व्यथयन्त्येते

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha |
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so’mṛtatvāya kalpate ||

हिन्दी अनुवाद

हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर व्यक्ति को ये विचलित नहीं करते, जो सुख और दुःख में एक-सा रहता है, वही अमरता के योग्य होता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.15 का अर्थ क्या है?

हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर व्यक्ति को ये विचलित नहीं करते, जो सुख और दुःख में एक-सा रहता है, वही अमरता के योग्य होता है।

भगवद्गीता 2.15 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।