भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.9 · कार्यमित्येव यत्कर्म
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
kāryamityeva yatkarma niyataṃ kriyate’rjuna |
saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन, जब नियत कर्म केवल यह मानकर किया जाता है कि यह करना ही चाहिए, और आसक्ति तथा फल की इच्छा छोड़ दी जाती है, तब वह त्याग सात्त्विक माना जाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.9 का अर्थ क्या है?
हे अर्जुन, जब नियत कर्म केवल यह मानकर किया जाता है कि यह करना ही चाहिए, और आसक्ति तथा फल की इच्छा छोड़ दी जाती है, तब वह त्याग सात्त्विक माना जाता है।
भगवद्गीता 18.9 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।