भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 64 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.64 · सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥

sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śṛṇu me paramaṃ vacaḥ |
iṣṭo’si me dṛḍhamiti tato vakṣyāmi te hitam ||

हिन्दी अनुवाद

सबसे गुप्त मेरा परम वचन फिर से सुनो। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहूँगा।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.64 का अर्थ क्या है?

सबसे गुप्त मेरा परम वचन फिर से सुनो। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहूँगा।

भगवद्गीता 18.64 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।