भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 55 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.55 · भक्त्या मामभिजानाति

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ |
tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram ||

हिन्दी अनुवाद

भक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ। फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह उसी क्षण मुझमें प्रवेश कर जाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.55 का अर्थ क्या है?

भक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ। फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह उसी क्षण मुझमें प्रवेश कर जाता है।

भगवद्गीता 18.55 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।