भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 45 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.45 · स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ |
svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu ||
हिन्दी अनुवाद
अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा व्यक्ति किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.45 का अर्थ क्या है?
अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा व्यक्ति किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।
भगवद्गीता 18.45 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।