भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 26 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.26 · मुक्तसङ्गोऽनहंवादी
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥
muktasaṅgo’nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ |
siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate ||
हिन्दी अनुवाद
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, “मैं-मैं” नहीं करता, धैर्य और उत्साह से भरा है, और सफलता-असफलता में विचलित नहीं होता, वह सात्त्विक कहलाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.26 का अर्थ क्या है?
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, “मैं-मैं” नहीं करता, धैर्य और उत्साह से भरा है, और सफलता-असफलता में विचलित नहीं होता, वह सात्त्विक कहलाता है।
भगवद्गीता 18.26 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।