भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 16.3 · तेजः क्षमा धृतिः

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā |
bhavanti saṃpadaṃ daivīmabhijātasya bhārata ||

हिन्दी अनुवाद

— तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से वैर न रखना और अत्यधिक मान न चाहना — हे भारत, ये दैवी सम्पदा लेकर जन्मे मनुष्य के लक्षण हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 16.3 का अर्थ क्या है?

— तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से वैर न रखना और अत्यधिक मान न चाहना — हे भारत, ये दैवी सम्पदा लेकर जन्मे मनुष्य के लक्षण हैं।

भगवद्गीता 16.3 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।