भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 16.20 · आसुरीं योनिमापन्ना मूढा

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥

āsurīṃ yonimāpannā mūḍhā janmani janmani |
māmaprāpyaiva kaunteya tato yāntyadhamāṃ gatim ||

हिन्दी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, आसुरी योनियों में पड़कर, जन्म-जन्म में मोहित रहते हुए, वे मुझे नहीं पाते, और उससे भी नीची गति में चले जाते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 16.20 का अर्थ क्या है?

हे कुन्तीपुत्र, आसुरी योनियों में पड़कर, जन्म-जन्म में मोहित रहते हुए, वे मुझे नहीं पाते, और उससे भी नीची गति में चले जाते हैं।

भगवद्गीता 16.20 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।