भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 16.16 · अनेकचित्तविभ्रान्ता

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥

anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ |
prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake’śucau ||

हिन्दी अनुवाद

— अनेक विचारों में भटके हुए, मोह के जाल में फँसे और भोगों में डूबे हुए वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 16.16 का अर्थ क्या है?

— अनेक विचारों में भटके हुए, मोह के जाल में फँसे और भोगों में डूबे हुए वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

भगवद्गीता 16.16 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।