भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 12.7 · तेषामहं समुद्धर्ता
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
teṣāmahaṃ samuddhartā mṛtyusaṃsārasāgarāt |
bhavāmi nacirātpārtha mayyāveśitacetasām ||
हिन्दी अनुवाद
— हे पार्थ, मुझमें चित्त लगाने वाले उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु-रूपी संसार-सागर से उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 12.7 का अर्थ क्या है?
— हे पार्थ, मुझमें चित्त लगाने वाले उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु-रूपी संसार-सागर से उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
भगवद्गीता 12.7 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।