भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 12.4 · संनियम्येन्द्रियग्रामं
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
saṃniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva sarvabhūtahite ratāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
— और सब इन्द्रियों को संयम में रखते हुए, हर स्थिति में समान बुद्धि रखते हुए तथा सब प्राणियों के हित में लगे रहते हुए, वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 12.4 का अर्थ क्या है?
— और सब इन्द्रियों को संयम में रखते हुए, हर स्थिति में समान बुद्धि रखते हुए तथा सब प्राणियों के हित में लगे रहते हुए, वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं।
भगवद्गीता 12.4 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।