भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 19 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 12.19 · तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yena kenacit |
aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ ||
हिन्दी अनुवाद
— जो निन्दा और स्तुति को समान समझता है, मितभाषी है, जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तुष्ट रहता है, किसी घर से बँधा नहीं, स्थिर बुद्धि वाला और भक्ति से युक्त है — ऐसा मनुष्य मुझे प्रिय है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 12.19 का अर्थ क्या है?
— जो निन्दा और स्तुति को समान समझता है, मितभाषी है, जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तुष्ट रहता है, किसी घर से बँधा नहीं, स्थिर बुद्धि वाला और भक्ति से युक्त है — ऐसा मनुष्य मुझे प्रिय है।
भगवद्गीता 12.19 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।