भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 12.16 · अनपेक्षः शुचिर्दक्ष

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ |
sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जो किसी पर निर्भर नहीं, जो पवित्र और कुशल है, जो पक्षपात से रहित है और व्यथा से मुक्त है, जिसने स्वार्थ से प्रेरित सब आरम्भ छोड़ दिए हैं — ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 12.16 का अर्थ क्या है?

जो किसी पर निर्भर नहीं, जो पवित्र और कुशल है, जो पक्षपात से रहित है और व्यथा से मुक्त है, जिसने स्वार्थ से प्रेरित सब आरम्भ छोड़ दिए हैं — ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।

भगवद्गीता 12.16 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।